डर एक ऐसी भावात्मक अनुभूति है जिसे हम किसी भी परिस्थिति में पाते हैं तो उस परिस्थिति से या तो बचने का प्रयास करते हैं या फिर उसका मुकाबला करते हैं या फिर मानसिक रूप से परेशान भी हो सकते हैं। जब भी हम डर की बात करते हैं तो सोचते हैं कि डरना नहीं चाहिए लेकिन डर के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर हमारा ध्यान नहीं जाता है। अगर हम डर के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझें तो हम इसका बेहतर तरीके से सामना कर पाएंगे।
संवेग-
डर एक प्रकार का संवेग है इसलिए यह जरूरी है कि डर को समझने से पहले हम यह समझ पाए कि संवेग है क्या और यह किस तरीके से कार्य करते हैं और किस प्रकार से हमारी जिंदगी को प्रभावित करते हैं।
संवेग एक प्रकार की भावात्मक अनुभूति है जिसका सामना हम हर क्षण और हर परिस्थिति मे करते हैं। संवेग का पता लगाने का सबसे आसान तरीका यह है कि जब हम इसका अनुभव कर रहे होते हैं तब हमारे शरीर में या तो आंतरिक रूप से या बाह्य रूप से कोई न कोई परिवर्तन नजर आता है। हम आंतरिक रूप से परेशान या खुश हो सकते हैं या फिर बाह्य रूप से हमारे चेहरे पर कोई भाव नजर आ सकते हैं या फिर हमारे शरीर में कोई परिवर्तन नजर आ सकते हैं या फिर आवाज में भी परिवर्तन नजर आ सकते हैं। परिस्थिति से संवेग उत्पन्न होने के बाद हम संवेग पर आधारित कोई न कोई व्यवहार करते हैं। इस प्रकार परिस्थिति, संवेग और व्यवहार परस्पर संबंध रखते हैं।
अगर आप किसी मॉल में जाते हैं और आपके जाते ही वहां पर एक आत्मघाती हमलावर आ जाता है ऐसी स्थिति में आप मे डर का संवेग विकसित हो सकता है और इस संवेग पर आधारित आपका व्यवहार वहां से पलायन का हो सकता है लेकिन समान परिस्थिति में आत्मघाती हमलावर में आत्म गौरव का संवेग विकसित हो सकता है और उसका व्यवहार वहां सबको नुकसान पहुंचाने का हो सकता है। इसी प्रकार एक मां जब अपने घर आती है और उसका बच्चा देखते ही मां से चिपक जाता है तो मां में वात्सल्य का संवेग विकसित हो सकता है और उससे जुड़ा व्यवहार बच्चे को गोद में उठाना हो सकता है। अगर आपने अपने घर की दीवार पर नया रंग किया है और कोई व्यक्ति उस पर गुटका थूक जाता है तो उससे क्रोध का संवेग विकसित हो सकता है और उससे जुड़ा व्यवहार लड़ाई हो सकता है। अगर आपके सामने आपका मनपसंद खाना आ जाए तो ऐसी परिस्थिति में आपके अंदर भूख का संवेग विकसित हो सकता है और इससे जुड़ा व्यवहार खाना खाना हो सकता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि दैनिक जीवन में हमारे सामने हर वक्त एक परिस्थिति होती हैं और परिस्थिति से एक संवेग विकसित होता है और फिर वही संवेग हमारे व्यवहार को निर्धारित करता है।
संवेगों का संतुलन -
जैसा कि हम समझ चुके हैं कि संवेग हमारे व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। अगर संवेगों मे असंतुलन अर्थात कमी या अधिकता होती है तो हमारे व्यवहार में भी असंतुलन हो सकता है। अगर एक प्रेमी किसी प्रेमिका के अत्यधिक प्यार में अपने शरीर पर टैटू बनवा लेता है तो यह असंतुलित व्यवहार होगा क्योंकि भविष्य मे अगर वही प्रेमिका उसे छोड़ देती हैं तो वह टैटू उसके लिए समस्या बन सकता है। अगर एक व्यक्ति को गंभीर बीमारी की वजह से ऑपरेशन की आवश्यकता है और वह ऑपरेशन की परिस्थिति से अत्यधिक भय का संवेग विकसित कर लेता है तो ऐसी स्थिति में उसका व्यवहार ऑपरेशन से दूर भागने का होगा जो कि असंतुलित होगा क्योंकि वह उसे और अधिक बीमार बना देगा। अगर एक बच्चे के अंदर सांप के प्रति भय का संवेग विकसित नहीं होता है ऐसी स्थिति में बच्चा सांप के साथ खेल सकता है और सांप अगर उसे काट दें तो उसकी मौत भी हो सकती हैं ।यह भी एक असंतुलित व्यवहार होगा।
संवेगों का संतुलन ना सिर्फ हमें परिस्थितियों से समायोजन में मदद करता है बल्कि उन परिस्थितियों में हमारे व्यवहार को भी नियंत्रण मे रखने में मददगार होता है। जो व्यक्ति अपने संवेगो में संतुलन स्थापित कर सकता है और सामने वाले व्यक्ति के संवेगों को भी पहचानते हुए उसके अनुसार व्यवहार करता है उसे इमोशनल इंटेलिजेंट व्यक्ति कहा जाता है। डैनियल गोलमैन ने इमोशनल इंटेलिजेंस को बहुत अधिक महत्व दिया है और इसे जीवन के लिए इंटेलिजेंस से भी ज्यादा जरूरी बताया है।
डर-
अगर लोगों को डर नहीं लगता, तो वे वैध खतरों से खुद को बचाने में सक्षम नहीं होते। डर शारीरिक और भावनात्मक खतरे के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया है जो पूरे मानव विकास में महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन विशेष रूप से प्राचीन समय में जब पुरुषों और महिलाओं को नियमित रूप से जीवन या मृत्यु की स्थितियों का सामना करना पड़ता था।
डर से व्यक्ति का सामना 6 महीने की अवस्था में ही हो जाता है। 6 महीने की अवस्था में व्यक्ति में नकारात्मक संवेगों का निर्माण शुरू हो जाता है और सबसे पहले भय, घृणा, और क्रोध जैसे नकारात्मक संवेगों का निर्माण होता है। 10 से 12 माह की अवस्था में कुछ सकारात्मक संवेग जैसे प्रेम , सहानुभूति, आत्मगौरव आदि का विकास होता है। 6 महीने की अवस्था में डर के संवेग का विकास इसलिए हो पाता है क्योंकि डर के लिए हमारे दिमाग में बहुत छोटा सा हिस्सा जिसे Amygdala कहते हैं 6 महीने की अवस्था में सक्रिय होना शुरू हो जाता है। दिमाग के एक बहुत बड़े हिस्से का विकास बाल्यावस्था तक पूरा हो जाता है ऐसे में अगर बच्चे को बाल्यावस्था तक अधिक डरावनी स्थितियों जैसे कि डांट-फटकार, भूत का डर, डॉक्टर के इंजेक्शन का डर , टीचर की डांट , बात-बात पर डराना, अपनी बात मनवाने के लिए डराना आदि का सामना कराया जाता है तो Amygdala अधिक सक्रिय हो जाता है। Amygdala के अधिक सक्रिय होने की वजह से डर के संवेग की अधिकता बच्चे में विकसित हो जाती हैं और उसका व्यवहार असंतुलित हो जाता है जिससे भविष्य में इसके परिणाम दुखद हो सकते हैं जैसे कि फोबिया, तनाव, विद्रोह की भावना आदि।
डर के बाद संभावित व्यवहार-
जब किसी परिस्थिति से डर का संवेग विकसित होता है तो आमतौर पर हमारे 4 संभावित व्यवहार हो सकते हैं-
1.Freeze- जब हमारे सामने कोई ऐसी परिस्थिति आती है जिससे डर का संवेग विकसित हो रहा हो तो हम एक बार के लिए रुक जाते हैं और डर पैदा करने वाले उद्दीपन की ओर निगाहें बनाकर देखते हैं और अगले निर्णय के लिए इंतजार करते हैं।
2.Fight - इस संभावित व्यवहार में डर पैदा करने वाले उद्दीपन के खिलाफ व्यक्ति विद्रोह कर देता है और उस से जूझने का प्रयास करता है।
3.Flight- अगर व्यक्ति डर पैदा करने वाले उद्दीपन से जूझने या विद्रोह करने का साहस नहीं करता है तो हो सकता है वह उस उद्दीपन या उस परिस्थिति से दूर चला जाए।
4.Fright- ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने ऊपर डर पैदा करने वाले उद्दीपन या परिस्थिति को ज्यादा हावी पाता है और भयभीत हो जाता है ऐसी स्थिति के परिणाम आगे चलकर तनाव ,चिंता आदि नकारात्मक स्थितियों में परिवर्तित हो जाते हैं।
डर के संभावित दुष्परिणाम-
डर के संवेग का अधिक विकास होने के कारण फोबिया हो सकता है। फोबिया पांच व्यापक श्रेणियों में आते हैं:-
1.जानवरों का फोबिया-जैसे कि कुत्तों का डर (साइनोफोबिया), मकड़ियों (अरकोनोफोबिया), या कीड़े ( कीटोफोबिया या एंटोमोफोबिया) । ज़ोफोबिया के रूप में जाने जाने वाले इन डरों में चमगादड़ ( चिरोप्टोफोबिया) और सांपों या छिपकलियों (हर्पेटोफोबिया) का डर भी शामिल है ।
2.प्राकृतिक वातावरण का फोबिया-जैसे ऊंचाई (एक्रोफोबिया) या तूफान का डर। इन फोबिया में आग का डर ( पायरोफोबिया) और अंधेरे का डर (निक्टोफोबिया) भी शामिल है।
3.रक्त ( हीमोफोबिया) -चोट और इंजेक्शन से संबंधित भय, जैसे कि सुइयों का डर ( ट्रिपैनोफोबिया) या दंत चिकित्सा (डेंटोफोबिया) सहित चिकित्सा प्रक्रियाएं ।
4.परिस्थितिजन्य फोबिया-जैसे उड़ने का डर ( एरोफोबिया), सार्वजनिक बोलने का डर (ग्लोसोफोबिया) , या लिफ्ट में सवारी करने का डर, जो अपने आप में बंद जगहों ( क्लॉस्ट्रोफोबिया) का एक प्रकार का डर है।
5.अन्य, जैसे उल्टी या घुटन का डर।
फोबिया के अलावा डर की वजह से अत्यधिक तनाव, चिंता जैसी स्थितियों का सामना भी करना पड़ सकता है। डर की वजह से व्यक्ति अपनी सेल्फ इमेज को परिस्थितियों के सामने छोटा पाता है। तनाव , चिंता जैसी स्थितियों की वजह से व्यक्ति शारीरिक समस्याओं का भी शिकार हो सकता है।
डर को दूर करने के उपाय-
अभी हमने जाना कि डर का विकास बचपन से होना ही शुरू हो जाता है और अगर किसी व्यक्ति को किसी परिस्थिति से डर लगता है तो उसके कारण कहीं ना कहीं उसकी पूर्व यात्रा में रहे होते हैं। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है कि बचपन से लेकर अब तक ऐसे क्या कारण रहे जिससे यह डर का विकास हुआ उसे जानना बहुत आवश्यक होता है। कारण पता लगने के बाद जिन परिस्थितियों से डर लगता है उसके सामने अपनी सेल्फ इमेज को मजबूत बनाना पड़ता है। सेल्फ इमेज मजबूत बनने के बाद हम फ्लाइट वाली स्थिति के बजाए फाइट वाली स्थिति में पहुंच जाते हैं जिससे हम डर का मुकाबला आसानी से कर सकते हैं।
बच्चे को बचपन में डराना नहीं चाहिए और छोटे छोटे कामों के लिए डराने की आदत उसके भविष्य पर नकारात्मक असर डालती हैं इससे डर के संवेग का अत्यधिक विकास हो जाता है।
डर को दूर करने के लिए एक अच्छे काउंसलर की मदद लेनी चाहिए।