साहित्य युगो-युगो से मानव सभ्यता को सिंचित करता आ रहा है। मौखिक से लेकर ताड़ के पत्तों तक ,ताड़ के पत्तों से लेकर कागज की दुनिया तक और कागज से लेकर डिजिटल दुनिया तक हर युग में साहित्य अडिग रहा है। वर्तमान इंटरनेट की दुनिया में सोशल मीडिया का दौर चल रहा है। इस सोशल मीडिया ने साहित्य के लिए कुछ सुविधाएं विकसित की है तो कुछ चुनौतियां भी। सोशल मीडिया की वजह से साहित्य का स्वरूप भी बदला है। इंटरनेट ने तो साहित्य की सहज उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ लेखकों के प्रोत्साहन जैसे कई कार्यों में सकारात्मक भूमिका निभाई है लेकिन सोशल मीडिया के संदर्भ में यह स्थितियां कैसी है? इसकी गहनता से जांच करना आवश्यक है।
सोशल मीडिया का मनोविज्ञान और साहित्य पर इसका प्रभाव-
अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार किया गया है। लाइक, रिवॉर्ड, कमेंट जैसी व्यवस्थाएं हमारे मस्तिष्क में पर्याप्त मात्रा में डोपामाइन रिलीज करती है। डोपामाइन एक प्रकार का प्रेरक केमिकल है इसकी वजह से हम बार-बार सोशल मीडिया को देखने के लिए प्रेरित होते हैं और इसी के साथ शुरुआत होती है एक मनोवैज्ञानिक विकार FOMO- FEAR OF MISSING OUT की। इसमें अक्सर सोशल मीडिया यूजर को लगता है कि कोई ना कोई मैसेज या पोस्ट छूट गई है जिसकी वजह से वह बार-बार डिवाइस को देखते हैं।FOMO के अगले चरण में सोशल मीडिया उपयोगकर्ता information overload का शिकार होता है जो वर्तमान समय में anxiety , depression ,tension आदि का मूल कारण बनती है।
मुक्त प्रभाव से साहित्य अछूता नहीं है क्योंकि वर्तमान समय में साहित्यकार एवं पाठक दोनों सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े हुए हैं। वर्तमान समय में कई लेखक प्रसिद्धि हेतु ऐसे लेखन की तरफ ज्यादा झुकाव रखते हैं जिससे सोशल मीडिया पर उन्हें ज्यादा तारीफ मिल सके। यह सब डोपामाइन का ही खेल है।
FOMO एवं Information Overload जैसी स्थितियां लेखक के अचेतन मस्तिष्क को प्रभावित करती है परिणाम स्वरूप इनका स्पष्ट प्रभाव उनकी साहित्य रचना पर देखने को मिलता है।
सोशल मीडिया के संदर्भ में मनोविज्ञान का सामाजिक तुलना सिद्धांत भी सटीक सिद्ध होता है। इसके अनुसार व्यक्तियों में दूसरों के विरुद्ध स्वयं का मूल्यांकन करने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है। सोशल मीडिया व्यक्तियों को खुद की दूसरों से तुलना करने के लिए मंच प्रदान करता है जिससे ईर्ष्या अपर्याप्तता और कम आत्मसम्मान की भावना पैदा होती है। इनकी वजह से उपजी मनोविदलता की वजह से ही कई यूजर साहित्यकारों को घृणास्पद प्रतिक्रियाएं देते हैं जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव साहित्य पर भी पड़ता है।
सोशल मीडिया से साहित्य पर बढ़ता दबाव-
सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को प्रतिक्रिया देने का एक टूल प्राप्त हुआ है लेकिन सारे प्रतिक्रिया देने वाले लोग तार्किक और तथ्यात्मक सोच वाले हो यह जरूरी नहीं है। सोशल मीडिया पर एक बड़ा धड़ा पुष्टिकरण पूर्वाग्रह (Confirmation Bias) का शिकार है। यह एक प्रकार का संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह हैं जो उन सूचनाओं की तलाश करने वाली प्रवृत्ति को संदर्भित करता है जो हमारे पहले से मौजूद विश्वासों की पुष्टि करती है और उन सूचनाओं को अनदेखा करती है जो उनका खंडन करती है।।
Confirmation Bias होने की वजह से अक्सर सोशल मीडिया यूजर का एक बड़ा धड़ा उन साहित्यकारों के खिलाफ हो जाता है जो उनकी भावनाओं एवं विश्वास के अनुरूप नहीं लिखता है। प्रसिद्ध ब्रिटिश साहित्यकार जेके रॉलिंग ने बताया कि परिवार के संघर्ष के दिनों में वो अक्सर कल्पनाएं किया करती थी और उन्हीं से हैरी पॉटर लिखने की प्रेरणा मिली। जेके रॉलिंग की रचना में हैरी पॉटर मर जाता है लेकिन यह बात सोशल मीडिया यूजर्स को पसंद नहीं आती है। सोशल मीडिया यूजर्स के दबाव के कारण फिल्म निर्माताओं ने हैरी पॉटर को पुनर्जीवित दिखाया।
2020 में अरूंधती रॉय ने कोविड-19 पर एक लेख लिखा जिसे लेकर सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हुई और श्रमिकों के प्रति असंवेदनशील और राष्ट्र विरोधी जैसे आरोप उन पर लगे।
चेतन भगत द्वारा 2016 में प्रकाशित "वन इंडियन गर्ल" उपन्यास को सोशल मीडिया पर भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा उन पर स्त्री द्वेष और लिंगवाद को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगे।
इस तरह के दबाव के बहुत से उदाहरण अक्सर देखने को मिलते हैं और यह तथ्यात्मक और तार्किक ना होकर एक प्रकार से Confirmation Bias आधारित प्रतिक्रिया होती है। ऐसी घटनाओं से लेखकों और साहित्यकारों की अभिव्यक्ति की आजादी में खलल पड़ता है जो उन्हें मानसिक रूप से परेशान करता है। इसी दबाव के कारण कई लेखक और साहित्यकार रचना की मौलिकता की बजाय सोशल मीडिया यूजर्स की भावनाओं को तरजीह देने लगते हैं। यह एक प्रकार से साहित्य से उसकी आत्मा निकालने वाला कृत्य है।
सोशल मीडिया के दौर में बदलता साहित्य-
सोशल मीडिया ने मानव व्यवहार को पूरी तरह से बदल दिया तो भला साहित्य इससे कैसे अछूता रह जाता। सोशल मीडिया के दौर में लोग घंटों स्क्रीन पर समय व्यतीत करते हैं और हर सामग्री को त्वरित रूप से देखने की आदत विकसित हुई है। जबकि एक समय में साहित्य का स्वरूप कैसा था कि आपको उसके अंदर खुद को समाहित करना होता था। प्रत्येक किरदार को जीना पड़ता था और उसकी अनुभूति सदा सदा के लिए मनोमस्तिष्क में रह जाती थी। मानव की हर चीज त्वरित देखने की आदत की वजह से इस साहित्य ने अपना रूप बदल लिया और वर्तमान में insta- stories और insta- poems जैसे साहित्य प्रचलन में आने लगे हैं जिनमें छोटी-छोटी कहानियां एवं कविताएं सम्मिलित रहती हैं
सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसे साहित्य भी प्रचलन में आए हैं जिनमें मौलिकता का अभाव है और जिनमें सोशल मीडिया यूजर की भावनाओं को ज्यादा तरजीह दी गई है। सोशल मीडिया ने कंटेंट तक सभी की पहुंच बढ़ाई है जिससे कॉपी पेस्ट का प्रचलन भी साहित्य में अधिक बड़ा है। लोगों की रचनात्मकता में भारी कमी आई है । साहित्य के विशिष्ट भावों और शब्दों को खोजने के लिए विशिष्ट स्थान एवं परिस्थितियों पहुंचने वाले लेखकों की संख्या अब सीमित हो गई है।
यह स्पष्ट है कि सोशल मीडिया ने साहित्य की रचना और इस्तेमाल दोनों को बदल कर रख दिया है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शायद सोशल मीडिया साहित्य के भविष्य को भी निर्धारित करें।
इंटरनेट, साहित्य और भविष्य-
इंटरनेट की दुनिया विशाल है और जब हम सोशल मीडिया की बात करें तो हमें समझना होगा कि इंटरनेट की दुनिया में आने वाला संप्रेषण का अंश भर है। इंटरनेट ने साहित्य की पहुंच जनमानस तक की है। इंटरनेट की वजह से ही साहित्यिक रचनाएं शहरी क्षेत्र की चारदीवारी से निकलकर हर क्षेत्र तक पहुंच पाई है। इस बात का श्रेय हम भूलवश सोशल मीडिया को दे देते हैं। लेकिन वास्तव में यह साहित्यिक वेबसाइट जैसे माध्यमों ने किया है। सोशल मीडिया साहित्य के प्रचार का माध्यम हो सकता है प्रसार का नहीं।
सोशल मीडिया प्रचार के माध्यम से साहित्यकारों को प्रसिद्धि तो मिल जाती हैं लेकिन यह तात्कालिक होती है। इस प्रस्तुति में कितने तार्किक और साहित्य में रुचि लेने वाले लोग सम्मिलित हैं इस बात पर सदैव प्रश्नचिन्ह ही रहता है।
साहित्य के बेहतर भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि सोशल मीडिया से इत्तर प्लेटफार्म विकसित हो जहां साहित्यकार अपनी रचनाएं सब तक पहुंचा सके और केवल साहित्य का प्लेटफार्म होने की वजह से तार्किक एवं रुचि लेने वाले पाठक वहां जुड़ पाएंगे। इससे संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों, ट्रॉलिंग साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं काफी हद तक दूर हो पाएगी। आलोचनात्मक चिंतन ,तथ्यपरक चिंतन, वास्तविक प्रसिद्धि जैसे सकारात्मक मूल्यों का ठीक से विकास हो पाएगा।
इस दिशा में वर्तमान में कार्य निरंतर प्रगति पर है जैसे- प्'रतिलिपि' एक प्लेटफार्म है जिस पर साहित्यकार अपनी रचनाएं साझा कर सकते हैं एवं पाठक पढ़कर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इसी प्रकार ऑडियोबुक साहित्य की दुनिया में एक नई क्रांति हैं। Audible, Kuku Fm जैसे प्लेटफार्म ऑडियोबुक के रूप में साहित्य को एक नया आयाम दे रहे हैं।
साहित्य एक प्रकार से वैचारिक क्रांति का माध्यम रहा है किंतु सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक व्हाट्सएप टि्वटर आदि साहित्य का प्रचार भले ही करें किंतु इसकी आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसलिए साहित्य को इंटरनेट की दुनिया में ऐसे सशक्त माध्यम खड़े करने होंगे जो ना सिर्फ इसका प्रचार प्रसार करें बल्कि इसकी आत्मा को भी जीवित रखें।